Monday, October 26, 2009

सपनों का सफर

-डॉ. अशोक प्रियरंजन

तैरते हैं
असंख्य सुनहरे सपने
बेशुमार ख्वाहिशें
जिंदगी के गीत
उम्मीदों के फूल
तुम्हारी आंखों में

जब भी झांका हूं
इन आंखों में
तो महसूस की है मैने
अथाह गहराई
उभरते देखे हैं
अनेक प्रश्न
जो रह जाते हैं हर बार
अनुत्तरित?

अक्सर झलकती है
कुछ पाने की खुशी
खो जाने का डर
अनहोनी की आशंका
लड़की होने की कसक
तुम्हारी आंखों में

हर दिन
भोर की पहली किरन के साथ
टूटते हैं सपने
खिलने लगती हैं उम्मीदें
मेरी आंखों से छिटककर
सपने बस जाते हैं
तुम्हारी आंखों में

(फोटो गूगल सर्च से साभार)

Wednesday, October 1, 2008

इस देश के हालात से बापू उदास हैं


दंगे औ फसादात से बापू उदास हैं,
इस देश के हालात से बापू उदास हैं ।

सपनों की जगह आंख में है मौत का मंजर,
हिंसक हुए जजबात से बापू उदास हैं ।

बढते ही जा रहे हैं अंधेरों के हौसले,
जुल्मों की लंबी रात से बापू उदास है ं।

बंदूक बोलती है कहीं तोप बोलती,
हिंसा की शह और मात से बापू उदास हैं ।

तन पे चले खंजर तो कोई मन पे करे वार
हर पल मिले सदमात से बापू उदास हैं ।

आंसू कहीं बंटते तो कहीं दर्द मिल रहा,
ऐसी अजब सौगात से बापू उदास हैं ।

रंजन तुम्हारी आंख में क्यों आ गए आंसू,
इतनी जरा सी बात से बापू उदास हैं

-डॉ. अशोक प्रियरंजन

फोटो गूगल सर्च से साभार